गोस्वामी तुलसीदास जी की एक लाइन थी, “कवित विवेक एक नहीं मोरे सत्य कहूं लिख कागद कोरे’ लिखा-पढ़ा तो मैंने बहुत है, लिखता ही रहा हूं क्योंकि 29 साल हो गए। 97 में मैंने जर्नलिज्म शुरु किया था। जब ग्रेजुएशन फर्स्ट ईयर में था, अपने जीवन का सबसे कीमती समय मैंने सहारा न्यूज नेटवर्क को दिया,15 साल बतौर ग्रुप सीईओ और एडिटर एंड चीफ के रूप में। उससे पहले साधारण से एक रिपोर्टर के रूप में बाद में स्टार के साथ सीएनबीसी के साथ और ये तीन साल हमने भारत एक्सप्रेस का सफर पूरा किया। इकलौता चैनल है, जिसको एक खांटी पत्रकार ने लांच किया और तीन साल हम सबके सहयोग के साथ पूरा कर पाए।
मैं लिखता था, जब मैं क्लास छठी में था तब से लिखता था कविताएं, लेकिन मैंने कभी उसको इकट्ठा करके नहीं रखा, लिखता था खो जाता था। इधर बीच जो मैंने लिखा... मुझे खास शौक है कि मैं मोबाइल बदलता हूं तो मोबाइल तोड़ के फेंक देता हूं, केवल उसका फोन बुक रखता हूं। ना मेरे पास एक फोटो है, ना एक मेमोरी है। बस फोन बुक है जो ईमेल के साथ सिंगड है या फोन किसी बहुत खास को दे देता हूं या टूट जाता है।
मैंने एक दिन अनुमान लगाया कि कम से कम 10 सालों में हजारों रचनाएं खो गई इस तरह से, फिर मैंने सोचा की कुछ को बचा करके रखा जाए।
इस बार हेमंत भाई प्रोग्राम बना रहे थे। तो उनको अंजादा है की हल्काफुल्का मैं लिखता पढ़ता हूं। उन्होंने बोला कि गद्य तो किताबों के जरिए आ गया और हिंदी किताब आ गई,अंग्रेजी में आ गई। तुम जो छुप-छुप के लिखते हो उसको इस बार मैं चाहता हूं कि बोलो।
हम दोनों पुराने मित्र हैं। जब 1999 में मैं मुंबई पहुंचा था, तब ये पहले से मुंबई में थे। साल 2000 से हम मित्र हैं। 26 साल पूरा किया हमने अपनी दोस्ती के और 26 सालों से हमारी दोस्ती एक आवाज पर बनी हुई है। ये जैसे पुकारते हैं हम नंगे पाव भगे आते हैं।
मैं अभी मूवी देखी, तेरे इश्क में तो मैंने कभी कोई नज्म नहीं लिखी, छोटे-छोटे शे़र लिखे। लेकिन एक ग़ज़ल बहुत पहले लिखी थी, जो मुझे याद है कि 1995 में हिंदी संस्थान में हरीश जी होते थे। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में सबसे पहली मेरी रचना उन्होंने छापी थी, जो हिंदी संस्थान की पत्रिका थी। मेरी सोशल मीडिया हेड पूजा जी ने निकाल के मुझे वो भेजी, तो सबसे ज्यादा खुशी मुझे उसके आने पर हुई। उसको ही मैं पढूंगा और मैंने अजहर इकबाल साहब से बशीर बद्र साहब का एक शेर पूछा कि उन्हीं का है ना क्योंकि बहुत पहले मैंने सुना था, तो मेरी जिंदगी ऐसी हो गई है कि उस श़ेर से शुरुआत करुंगा, कि कामधाम और एक बड़ा चैनल चलाने की जो जिम्मेदारी है वो कई सफेद हाथियों को पालने के बराबर है।
मेरी जिंदगी अब ऐसी होकर रह गई है कि, सुबह तक शाम की नजरों से गिर जाता हूं...सुबह तक शाम की नजरों से गिर जाता हूं, इतने वादों में जीता हूं कि मर जाता हूं।
यह बशीर बद्र साहब का श़ेर है लेकिन ये जो मेरी पहली ग़ज़ल थी, जीवन की जो 1995 नें हरीश जी ने छापी थी तब मैं लखनऊ में दसवीं पास करके आया था अपने गांव से।
जो गजल ये थी- क्या खोया क्या पाया, क्या बताएं आपको...वक्त ने कितना सताया क्या बताएं आपको।
प्यार की दहलीज पे पहला कदम रखा ही था, उसने मुझे ऐसा गिराया...क्या बताएं आपको।
नाम जिनका बीच में पन्ने पे होना चाहिए, हासिए पे उनको पाया क्या बताएं आपको।
सोचा था उनकी शिकायत जाके करुंगा उनके पास, उन दोनों को साथ पाया...क्या बताएं आपको।
दुबई में बैठे थे, एक मेरे दोस्त हैं जमील सैदी साहब, उन्होंने कहा कि वो उम्र में बड़े मेरे से,लेकिन इतने अदब और तहजीब वाले व्यक्ति हैं की मैं उम्र में छोटा हूं फिर भी मुझे भैया कह कर बुलाते है। मैं भी उनको जमील भैया ही कह के बुलाते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ उन्होंने लिखा कुछ मैंने लिखा तो उन्होंने कहा कि पिता पुत्र पर एक मजबूत श़ेर लिखिए। मैं क्षणिक भी लिख लेता है। फिर मैंने आंख बंद की और मैंने अपने पिताजी के बारे में सोचा और मैंने अपने और अपने बेटे के बारे में सोचा तो एक श़ेर लिखा मैंने-
कि दिल मोम सा जुबा पत्थर सी पुरजोर आदमी था, मरने के बाद बेटे कहे बाप मेरा शेर आदमी था।
मैंने इसी तेवर से जिंदगी जी, मैं मरुं तो मेरा बेटा कहे कि नहीं मेरा बाप जुझारु था। कायर नहीं था। इतनी तो जिंदगी जी ली है मैंने कि मैं अपने बेटे नजर में श़ेर जाना जाऊं कायर नहीं।
जब लिखा तो ऐसा ही लिखा थोड़ा सा। और जब मैंने वो मूवी देखी तो मैं जब लिखने के लिए कलम उठाया तो मेरे आप कुछ था नहीं। इंडिगो की एक लड़की (एयर होस्ट) ने मेरे बारे में कुछ लिखा था फ्लाइट में वो पहचान गई थी। वही कागज पहला मिला (श्रोतागण को दिखाते हुए) मैंने दो नुक्ते इस पर लिखे।उसके बाद फिर एक डायरी (दिखाते हुए) इमरेट्स (विमानन कंपनी) में ट्रेवल कर रहा था,वहां से लाया था। फिर उस पर लिखे।
शुरुआत यहां से की, वो मूवी जिसने देखी होगी जरुर रिलेट करेगा,उस मूवी को नज्म में उतार दिया-
ये जो जलता हुआ इश्क है इसको समझ से मैं समझा नहीं सकता
कोई मुझसे पूछे कि तूने ये क्या किया, मैं ये बता नहीं सकता।
मैं जो तेरे साथ रहते रहते जी गया वो वक्त मेरा था
हमारे बीच क्या बातें हुई अगर तू मुझसे पूछे कि ऐसा मैंने कहा तो नहीं था
मैं किसी को बता नहीं सकता।।
दूसरी -
तुम कहते कहते रुक गई थी लबों के मीनार पर,
वो क्या था जो तुम्हें रोक गया मैं समझा नहीं सकता।
तुमसे जो बिन मिले अकेले में बातें हो गईं,वो खुदा को भी मैं बता नहीं सकता
जो दांव पर लगाकर जान की बाज़ी रोज खेलते है, मैं तुम्हारे लिए रोज लगाने का हौसला रखता हूं ये किसी को बता नहीं सकता।
यूं तो हम महफिल में मिलके भी पराए से लगते हैं
गले लगा लूं तो भी तुझे गले लगा नहीं सकता।
ऐसा कभी सोचा ही नहीं कि ये सोचूं कि तुम इतने करीब तक आई।
और मैं देखूं और ये बताऊं कि गले लगने के बाद कितनी दूरी है तुम्हें समझा नहीं सकता।
अगली लाइन जो बन पाई उस मूवी को समेटते हुए-
मर तो सकता हूं उसके खातिर लेकिन उसके लिए कई बार मरा, ये दुनिया को बता नहीं सकता
कोई और जिंदगी होगी तो उससे पूछूंगा, कि जान देने का जज्बा रखने वाला क्या तेरे इतने करीब तक आ नहीं सकता।।
तीसरी-
शजर जो पुकारे तो परिंदे दूर से भी आ जाते हैं
मैं तुम्हारे करीब रह करके पुकारता रहा, तुमने सुना ही नहीं।
चौथी-
जो बदल गया रद्दो बदल में, मैं सोचता हूं नहीं बदला
पर इतना बदला कि झूठ बोलने लगा।।
मेरे छोटे भाई है उसके दो जुड़वा बच्चे हैं, उनका एडमिशन एक मशहूर स्कूल में हुआ। मैंने किसी से मदद मांगी, तो उसने कहा कि भैया एडमिशन तो हो गया। असंभव सा काम था। मैं उनको थैंक्यू देने जाना चाहता हूं। मैं नंबर दे दिया उसने फोन क्या तो उन्होंने कहा की मैं थैंक्यू लेना नहीं चाहता...तो उसने कहा कि भैया इस सिचुएशन पर एक श़ेर लिखिए आप,मैंने कहा ठीक है लिखता हूं-
जिसकी प्यास दरिया भी बुझा नहीं सकती, हम कतरा बन कर बनकर प्यास बुझाने की क्यों जाएं।
हमने बहुत बताने की कोशिश की
लेकिन उसने बताया ही नहीं कि उसकी प्यास कहां तक है।।
गांव से बहुत करीबी दोस्त आया।जिंदगी बदल जाती है, जब शहरों में रहते हैं। काम करने के तरीके बदल जाते हैं। लेकिन जो बचपन की यादें हैं वो कभी नहीं बदलती। बचपन में आप पहचानते हैं किसी को वो पहचान हमेशा कायम रहती है-
उसने पूछा कि और बताओ कैसे हो, क्या हो...मैंने बोला देखो कारोबार व्यापार की बातें बताऊंगा तुम समझोगे नहीं।
मेरा छोटा भाई जो साथ में ट्रेवल करता है उसको भी समर्पित करके मैंने उसके लिए श़ेर लिखा...
तुम जो हो तुम्हारे आने पर बचा ही नहीं,
ऐसा क्या है जो तुम को पता ही नहीं।
24 दिसंबर को दुबई से लंदन जा रहा था, उस दौरना मैंने एक श़ेर लिखा। ऐसा ही सोच रहा था कि क्या पाया क्या खोया। एक बड़ा श़ेर बना जो मुझे लगता है की अबतक का मेरे जीवन का अभी तक का सबसे भारी श़ेर यही है-
क्या तकसीम (बंटवारा) करुं कुछ बचा ही नहीं,
ये बहुत बाद में समझ में आया कुछ था ही नहीं।
आप लोग अब अजहर इकबाल जी को सुनिए, अबरार कासिम साहब को सुनिए, स्वयं जी को सुनिए, नीलोत्पल जी को सुनिए। मंच मेरा था, मैंने इस मंच से शुरुआत की, और हम लोग भी इन्हीं लोगों को सुनने के लिए आएं है। ये हमारे लिए गौरव की बात है।
इंदौर को मैं अपना ही शहर मानता हूं, क्योंकि इस शहर में शायद अपने गांव के बाद दूसरी जगह है जहां सबसे ज्यादा बार आया हूं। ( 24 फरवरी 2026 को मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी इंदौर के मशहूर रवीन्द्र नाट्यगृह में ‘प्रजातंत्र मीडिया फाउंडेशन’ की ओर आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरा में )